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भारत-चीन को चाहिए एक-दूजे का साथ

शशांक, पूर्व विदेश सचिव

चीन-यात्रा में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यह सूचना दी कि इस साल मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन की पहली यात्रा पर जाएंगे, क्योंकि दोनों ही देश उच्चस्तरीय वार्ता को गति प्रदान करने के इच्छुक हैं। विदेश मंत्री ने भारत-चीन संबंधों को मजबूत बनाने के लिए छह सूत्री मॉडल भी पेश किया है और सबसे महत्वपूर्ण यह कि कैलाश-मानसरोवर यात्रा के लिए नए मार्ग पर भी सहमति बनी, जिससे भारतीय श्रद्धालुओं को फायदा होगा। मानसरोवर यात्रा में हर साल दिक्कतें बढ़ती जा रही थीं। वर्तमान मार्ग लिपुलेख दर्रा 2013 में उत्तराखंड में आई तबाही के कारण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। ऐसे में, नाथुला दर्रे से रास्ते पर बनी सहमति का एक बड़ा लाभ यह भी है कि इसके जरिये बड़े-बुजुर्ग भी धार्मिक स्थल की यात्रा कर पाएंगे, क्योंकि अब बस से यात्रा मुमकिन हो जाएगी और यह अपेक्षाकृत कम जोखिम भरी भी होगी।

दोनों तरफ से विदेश प्रतिनिधि के स्तर पर वार्ता की जो शुरुआत हुई है, वह साफ बताती है कि दोनों तरफ के शासनाध्यक्ष संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में रुचि ले रहे हैं। जाहिर है, ऐसे में कई मुद्दों पर नतीजे अपनी सार्थकता के साथ जल्द ही आएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच तीन महत्वपूर्ण बैठकें हो चुकी हैं। पिछले साल सितंबर में ही शी जिनपिंग भारत दौरे पर आए थे। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारतीय दौरे के दौरान अमेरिका के साथ ‘श्रेष्ठ साझेदारी’ कर और एशिया-प्रशांत व हिंद महासागरीय क्षेत्र के लिए संयुक्त रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाकर नरेंद्र मोदी सरकार विदेश नीति में अगले लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। सरकार आंतरिक मसलों पर आर्थिक प्रगति के लिए विभिन्न तरह के सफाई अभियान और मेक इन इंडिया जैस कैंपेन चला रही है। वहीं दूसरी तरफ, बाहरी मोर्चे पर सरकार पड़ोसी देशों, विशेषकर दक्षिण एशियाई देशों के साथ बेहतर रिश्ते बनाती-बढ़ाती जा रही है।

भारत-चीन के रिश्ते काफी जटिल हैं। दोनों देशों की सीमा लगभग 4,000 किलोमीटर लंबी है। भारत और चीन, दोनों पुरानी एशियाई सभ्यताएं हैं और हमारा व्यापार व सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सदियों पुराना इतिहास है। हमने उनसे जितना कुछ सीखा है, उससे अधिक उन्होंने हमसे सीखा है। तमाम कड़वाहटों के बीच वहां अब विश्व बौद्ध सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा है।

चीन एक बड़ी आर्थिक शक्ति है। ऐसा कहा जा रहा है कि आने वाले वर्षों में वह अमेरिका से आगे निकल जाएगा। सारे न्यूक्लियर और मिसाइल समूह में वह शामिल है और विश्व के बड़े समूहों में भी उसका नाम है। इसलिए, उससे हमारा बर्ताव, हमारे रिश्ते उस तरह के नहीं हो सकते, जिस तरह वे पाकिस्तान से हैं। बेशक, महत्वाकांक्षाओं की टकराहट है, लेकिन इसी के साथ हमें बातचीत जारी रखनी होगी और लगातार यह देखना होगा कि बातचीत के किसी बिंदु पर दोनों के हित आहत न हों। यह भी गौरतलब है कि भारत-चीन के बीच सालाना द्विपक्षीय कारोबार 70 अरब डॉलर को पार कर चुका है। इसलिए चीन के साथ आर्थिक स्तर पर बहुत सारी बातें होनी चाहिए। रही बात कूटनीतिक वार्ताओं की, तो उस दिशा में भी प्रगति जारी रहनी चाहिए, अच्छी बात यह है कि ऐसी प्रगति अब दिख रही है।

संबंधों में शंकाओं और अनिश्चितताओं को कैसे दरकिनार रखा जा सकता है, इसकी बड़ी सीख अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के उस बयान से मिलती है, जो उन्होंने भारत दौरे के बाद चीन के संदर्भ में दिया था। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच के रिश्ते को लेकर चीन की बेचैनी की कई खबरें आई हैं, जबकि उसे दिक्कत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि चीन के साथ भी हमारे रिश्ते बहुत अच्छे हैं और हम भारत के साथ अपने रिश्ते को और अच्छा करना चाहते हैं। जाहिर है कि जब एक देश से अच्छे रिश्ते बन रहे हों, तो इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि किसी और से रिश्ते बिगड़ रहे हैं, बल्कि विश्व कूटनीति में इसे ऐसे देखा जाना चाहिए कि संभावनाओं के नए दरवाजे खुल रहे हैं। इसलिए अमेरिका के साथ रिश्ते अच्छे कर भारत, चीन के साथ भी संबंधों में बेहतरी ला सकता है।

हमारी असली चिंता चीन-पाकिस्तान संबंध को लेकर है, क्योंकि चीन हमेशा पाकिस्तान की मदद करता रहता है। हालांकि, चीन हमेशा यही कहता है कि वह भारत और पाकिस्तान के आपसी मामलों में दखल नहीं देगा। वर्षों तक यह नीति रही भी। लेकिन बीते कुछ वर्षों में ऐसा दिखा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चीन ने अपनी आर्थिक गतिविधियां बढ़ाई हैं। जाहिर है, इस मुद्दे पर हम अलग राह पकड़ लें, तो यह समझदारी नहीं। जरूरत यहां यह है कि हम चीन से इस पर सीधी बातचीत करें और अपनी राय दें। हमें यह बताना होगा कि पाकिस्तान के अंदरूनी हालात ऐसे हैं कि वह किसी के साथ नहीं हो सकता, खुद चीन के यहां आतंकवाद में उसकी भूमिका देखी जा रही है। सिर्फ तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के नाम पर चीन हमसे मतभेद रखकर और निजी खुन्नस में पाकिस्तान को जोड़कर अपनी एकता-अखंडता से कब तक समझौता कर सकता है? अगर हम पूरे क्षेत्र में सुख-शांति और समृद्धि चाहते हैं, तो इससे किसी को भी ऐतराज नहीं हो सकता, चीन को भी नहीं। लेकिन इसके लिए हमें अपने दृष्टिकोण को इस तरह से पेश करना होगा कि हमारे ‘हित’ आपके लिए ‘अहित’ नहीं हैं।

पाकिस्तान के साथ हमने यह नीति बार-बार अपनाई। उसका असर यह तो जरूर पड़ा कि उसने अपने नजरिये से अच्छे और बुरे आतंकवाद के फर्क कम किया है। वहां दहशतगर्दी के खिलाफ व्यावहारिक कदम नहीं उठे हैं, लेकिन वह सीमित स्तर पर छोटे-मोटे कदम जरूर उठाने लगा है। अगर हम चीन को समझाएं कि यह आतंकवाद उसके लिए कितना बड़ा खतरा है, तो एक शुरुआत हो सकती है, आखिरकर जो पड़ोसी आपको नुकसान पहुंचा रहा है, उस पर कोई कितना खर्च करेगा?

अक्सर होता यह है कि लोग ऐसे संबंधों में जल्द नतीजे चाहते हैं या उनकी आशा रहती है कि तुरंत इधर या उधर का रास्ता बने। वैश्विक कूटनीति में यह संभव नहीं होता और क्षेत्रीय कूटनीति में तो सब कुछ अच्छा मुमकिन ही नहीं, क्योंकि हम पड़ोसी नहीं बदल सकते, जहां अलग-अलग विचार, अलग-अलग हित, अलग-अलग दृष्टिकोण साथ-साथ पलते हैं। भारत और चीन के बीच बेहतर संबंध द्विपक्षीय रिश्ते के लिए ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शांति व समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)